Tuesday, 29 March 2022

नवरात्रि व्रत

नवरात्र व्रत



देवीभागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध 26वे अध्याय में  शरत्काल तथा बसन्त ऋतू में नवरात्र व्रत क्यों करते हैं इसको समझाते हुए व्यास जी कहते हैं  
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।
शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥ ३ ॥
वसन्ते च प्रकर्तव्यं तथैव प्रेमपूर्वकम् ।
द्वावृतू यमदंष्ट्राख्यौ नूनं सर्वजनेषु वै ॥ ४ ॥
शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह ।
तस्माद्यत्‍नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता ॥ ५ ॥
द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम् ।
वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ ॥ ६ ॥
तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः ।
चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप ॥ ७ ॥


जिसका सरल भाषा में अर्थ है शरद ऋतु तथा बसन्त ऋतु प्राणियों लिए यमदंष्ट्रा कही गयी हैं और प्राणियों के लिए दुर्गम हैं। ये दोनों ऋतुएं बड़ी भयानक हैं और मनुष्यों के लिए रोग उत्पन्न करने वाली हैं और सबका विनाश भी कर सकती हैं। अतः आत्मकल्याण के इच्छुक व्यक्ति को बड़े यत्न के साथ नवरात्र व्रत करना चाहिए। चैत्र तथा आश्विन मास में भक्तिपूर्वक चण्डिका देवी का पूजन करना चाहिए।


27वे अध्याय में नवरात्र व्रत की महिमा बताई गयी है


व्रतानि यानि चान्यानि दानानि विविधानि च ।
नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले ॥
धनधान्यप्रदं नित्यं सुखसन्तानवृद्धिदम् ।
आयुरारोग्यदं चैव स्वर्गदं मोक्षदं तथा ॥
इस पृथ्वीलोक में जितने भी प्रकार के व्रत एवं दान हैं, वे इस नवरात्र व्रत के तुल्य नहीं हैं क्योंकि यह व्रत सदा धन-धान्य प्रदान करने वाला, सुख तथा संतान की वृद्धि करने वाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करने वाला और स्वर्ग तथा मोक्ष देने वाला है।


विद्यार्थी वा धनार्थी वा पुत्रार्थी वा भवेन्नरः ।
तेनेदं विधिवत्कार्यं व्रतं सौभाग्यदं शिवम् ॥
विद्यार्थी सर्वविद्यां वै प्राप्नोति व्रतसाधनात् ।
राजभ्रष्टो नृपो राज्यं समवाप्नोति सर्वदा ॥
अतएव विद्या, धन अथवा पुत्र इनमें से मनुष्य किसी की भी कामना करता हो, उसे इस सौभाग्यदायक तथा कल्याणकारी व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिए। इस व्रत का अनुष्ठान करने से विद्या चाहने वाला मनुष्य समस्त विद्या प्राप्त कर लेता है और अपने राज्य से वंचित राजा फिर से अपना राज्य प्राप्त कर लेता है।


महापातकसंयुक्तो नवरात्रव्रतं चरेत् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ॥
यदि कोई महापापी भी नवरात्रव्रत कर ले तो वह समस्त पापों से मुक्ति पा लेता है इसमें लेशमात्र भी विचार नहीं करना चाहिए।


राज्यभ्रष्टेन रामेण सीताविरहितेन च ।
किष्किन्धायां व्रतं चैतत्कृतं दुःखातुरेण वै ॥
प्रतप्तेनापि रामेण सीताविरहवह्निना ।
विधिवत्पूजिता देवी नवरात्रव्रतेन वै ॥
राज्य से च्युत तथा सीता के वियोग से अत्यन्त दुःखित श्रीराम ने किष्किन्धापर्वत पर इस व्रत को किया था सीता की विरह अग्नि से अत्यधिक संतप्त श्रीराम ने उस समय नवरात्र व्रत के विधान से भगवती जगदम्बा की भलीभाँति पूजा की थी।


विष्णुना चरितं पूर्वं महादेवेन ब्रह्मणा ।
तथा मघवता चीर्णं स्वर्गमध्यस्थितेन वै ॥
पूर्वकाल में भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्मा तथा स्वर्ग-लोक में विराजमान इंद्र ने भी इसका अनुष्ठान किया था।


विश्वामित्रेण काकुत्स्थ कृतमेतन्न संशयः ।
भृगुणाऽथ वसिष्ठेन कश्यपेन तथैव च ॥
विश्वामित्र, भृगु, वशिष्ठ और कश्यप भी इस व्रत को कर चुके हैं इसमें संशय नहीं है।


देवीभागवत पुराण में आया है “पूजाभिश्चैव होमैश्च कुमारिपूजनैस्तथा । सम्पूर्णं तद्‌ व्रतं प्रोक्तं विप्राणां चैव भोजनैः” अर्थात पूजन, हवं, कुमारी-पूजन तथा ब्राह्मण भोजन संपन्न करने से नवरात्र व्रत पूरा हो जाता है।


अगर कोई पूरे नवरात्र व्रत न कर सके तो
उपवासे ह्यशक्तानां नवरात्रव्रते पुनः ।
उपोषणत्रयं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप ॥
सप्तम्यां च तथाऽष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः ।
त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात् ॥
पूरे नवरात्र उपवास करने में असमर्थ लोगों के लिए तीन दिन का उपवास भी यथोक्त फल प्रदान करने वाला बताया गया है। भक्तिभाव से केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी इन तीन रात्रियों में देवी की पूजा करने से सभी फल सुलभ हो जाते हैं।


ऋषियों ने सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में असमर्थ लोगों के लिए सप्तरात्र, पंचरात्र, त्रिरात्र, युग्मरात्र और एकरात्र व्रत का विधान भी बनाया है.
प्रतिपदा से सप्तमीपर्यन्त उपवास रखने से सप्तरात्र-व्रत का अनुष्ठान होता है. इस व्रत को करने वाले अष्टमी के दिन माता को हलवा और चने का भोग लगाकर कुंवारी कन्याओं को खिलाते हैं तथा अन्त में प्रसाद को ग्रहण करके व्रत का पारण करते हैं.
पंचरात्र-व्रत पंचमी को दिन में केवल एक बार, षष्ठी को केवल रात्रि में एक बार, सप्तमी को बिना मांगे जो कुछ मिल जाय अर्थात अयाचित भोजन करके, अष्टमी को पूरी तरह उपवास रखकर, नवमी में केवल एक बार भोजन करने से पूर्ण होता है.
सप्तमी, अष्टमी और नवमी को केवल एक बार फलाहार करने से त्रिरात्र व्रत होता है.
आरंभ और अंत के दिनों में मात्र एक बार आहार लेने से युग्मरात्र व्रत तथा नवरात्र के प्रारंभिक अथवा अंतिम दिन उपवास रखने सेएकरात्र-व्रत सम्पन्न होता है.


नवरात्र व्रत न करने से होने वाले अपराध के विषय में व्यासजी कहते हैं


पूर्वजन्मनि यैर्नूनं न कृतं व्रतमुत्तमम् ।
ते व्याधिनो दरिद्राश्च भवन्ति पुत्रवर्जिताः ॥
वन्ध्या च या भवेन्नारी विधवा धनवर्जिता ।
अनुमा तत्र कर्तव्या नेयं कृतवती व्रतम् ॥
नवरात्रव्रतं प्रोक्तं न कृतं येन भूतले ।
स कथं विभवं प्राप्य मोदते च तथा दिवि ॥
नाराधिता येन शिवा सनातनी
दुःखार्तिहा सिद्धिकरी जगद्वरा ।
दुःखावृतः शत्रुयुतश्च भूतले
नूनं दरिद्रो भवतीह मानवः ॥
जिसका सरल भाषा में अर्थ है अगर किसी ने पूर्वजन्म में नवरात्र व्रत नहीं किया वह इस जन्म में रोगग्रस्त, दरिद्र, संतान रहित, विधवा है। न उसे इस लोक में वैभव मिला न स्वर्ग में आनंद। जिस मनुष्य ने दुःख तथा संताप का नाश करने वाली, सिद्धियां देने वाली, जगत में सर्वश्रेष्ठ, शाश्वत तथा कल्याण स्वरूपिणी भगवती की उपासना नहीं की, वह इस पृथ्वीतल पर सदा ही अनेक प्रकार के कष्टों से ग्रस्त, दरिद्र तथा शत्रुओं से पीड़ित रहता है।

नवरात्र प्रदीप में नारद से कथन है 


यावज्जीवं नरः स्त्री वा नवरात्रं महाव्रतम् ।

कुरुते चण्डिकाप्रीत्यै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥


जीवनपर्यन्त नर या नारी यदि नवरात्र नामक महाव्रत को चण्डिका देवी की प्रसन्नता के लिये करें तो भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करेंगे।



पंडित आर. के. राय. जी (प्रयाग) द्वारा लिखित लेख “दुर्गा पूजा का रहस्य” में उन्होंने बताया है की व्रत में नमक का नहीं करना चाहिए। पाठकों के लिए मैं वह यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहा हूँ

प्रायः नवरात्रि के व्रत में अक्सर लोग सेंधा नमक का प्रयोग करते है. नमक के बारे में यह पौराणिक कहावत है कि एक बार अगस्त्य ऋषि क्रोध करके समुद्र को ही पी गए. इससे धरती का संतुलन बिगड़ने लगा. प्रकृति का भी संतुलन असामान्य हो गया. तब सब देवी देवता मिल कर अगस्त्य ऋषि से समुद्र को छोड़ने क़ी प्रार्थना किये. तब अगस्त्य ऋषि ने समुद्र को पेशाब के रास्ते निकाल दिया. मूत्र मार्ग से निकलने के कारण इसका स्वाद खारा नमकीन हो गया. इसी लिए कहा गया है कि समुद्र में स्नान के बाद लोग अशुद्ध हो जाते है. तथा उसके बाद घर आकर पूजा यज्ञ आदि करना पड़ता है. चूँकि नमक समुद्र से ही बनता है. इसी लिए अशुद्ध होने के कारण व्रत उपवास आदि में नमक का प्रयोग वर्जित है. कुछ लोग सेंधा नमक का प्रयोग करते है. किन्तु कल्प भास्कर में लिखा है कि सैन्धव नमक यद्यपि पत्थर से बनता है. किन्तु यह पत्थर बहुत दिनों तक समुद्र में रहने के कारण ही नमकीन होता है. अतः कोई भी नमक व्रत में वर्जित है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि नमक सोडियम क्लोराईड होता है. यदि पेट में कोई अनाज नहीं होगा तो सोडियम को प्रतिक्रया करने का कोई आधार नहीं मिलेगा. तथा अत्यंत तीक्ष्ण होने के कारण यह तत्काल गैस्ट्रो इन्ट्रेटाईटिस पैदा कर देता है. यही नहीं यदि कही नमक में क्लोरिन क़ी मात्रा अधिक हुई तो ड्यूओडिनम अर्थात संग्रहणी अशक्त या डैमेज्ड हो जाती है. इसीलिए उपवास या व्रत में नमक नहीं खाना चाहिए.

जय माता दी 

Wednesday, 2 March 2022

नवग्रह स्त्रोत॥Navgruh Strota॥Charismatic Mantra

Navgraha Stotram was written by Rishi Veda Vyasa. It comprises of a set of hymns for worshipping the Navagrahas or the nine planets. The Navgrahas are highly powerful and influential forces of the universe that coordinate the life of people on the earth. Each of these nine planets has been ascribed with certain qualities that they bestow on all of us. Depending on the position of the planets and their interactions with other planets in the horoscope, individuals face beneficial or malefic results in their lives. 

Listen Navagraha Stotram in lyrics https://www.youtube.com/watch?v=sCGlQlRqBU4  and Chant or listen this Navagraha stotra daily during your prayer time with utmost faith and dedication. Worshipping the nine planets by chanting the Navgraha Mantra can invite their blessings and their presence can have benevolent effect on the worshipper and his activities.

महर्षि श्री वेदव्यास ने इस नवग्रह स्त्रोत की महत्ता बतायी है और कहा है की कोई भी जातक इसे दिन या रात्रि किसी भी समय पढ़ सकता है या सुन सकता है ॥ इसके नित्य पठन या श्रवण मात्र से ही नवग्रहों की कृपा दृष्टि आपके ऊपर बनी रहती है और उनके बुरे प्रभाव खतम हो जाते है ॥

॥ नवग्रह स्तोत्र ॥

अथ नवग्रह स्तोत्र। श्री गणेशाय नमः।

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम्।
तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम्॥१॥

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम्।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम्॥२॥

धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम्॥३॥

प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्॥४॥

देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥५॥

हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥६॥

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥७॥

अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥८॥

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥९॥

इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति॥१०॥

नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम्।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम्॥११॥

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः।
ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः॥१२॥

॥इति श्री वेदव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं॥

Navagraha Stotram in English

japākusuma saṅkāśaṃ kāśyapeyaṃ mahodyutim |
tamognaṃ sarva pāpaghnaṃ praṇatosmi divākaram ‖

dathiśaṅkha tuśhārābhaṃ kśhīrodārṇava sambhavam |
namāmi śaśinaṃ somaṃ śambhormakuṭa bhūśhaṇam ‖

dharaṇī garbha sambhūtaṃ vidyutkānti samaprabham |
kumāraṃ śaktihastaṃcha maṅgaldaṃ praṇamāmyaham ‖

priyaṅgu kalikāśyāmaṃ rūpeṇā pratimaṃ budham |
saumyaṃ saumya guṇopetaṃ taṃ budhaṃ praṇamāmyaham ‖

devānāṃ cha ṛiśhīṇāṃ cha guru kāñchanasannibham |
buddhimantaṃ trilokeśaṃ taṃ namāmi bṛihaspatim ‖

himakunda mṛuṇāldābhaṃ daityānaṃ paramaṃ gurum |
sarvaśāstra pravaktāraṃ bhārgavaṃ praṇamāmyaham ‖

nīlāñjana samābhāsaṃ raviputraṃ yamāgrajam |
Chāyā mārtāṇḍa sambhūtaṃ taṃ namāmi śanaiścharam ‖

ardhakāyaṃ mahāvīraṃ chandrāditya vimardhanam |
siṃhikā garbha sambhūtaṃ taṃ rāhuṃ praṇamāmyaham ‖

phalāśa puśhpa saṅkāśaṃ tārakāgraha mastakam |
raudraṃ raudrātmakaṃ ghoraṃ taṃ ketuṃ praṇamāmyaham ‖

iti vyāsa mukhodgītaṃ yaḥ paṭhetsu samāhitaḥ |
divā vā yadi vā rātrau vighnaśānti-rbhaviśhyati ‖

naranārī-nṛpāṇāṃ cha bhave-dduḥsvapna-nāśanam |
aiśvaryamatulaṃ teśhāmārogyaṃ puśhṭi vardhanam ‖

grahanakśhatrajāḥ pīḍāstaskarāgni samudbhavāḥ |
tāssarvāḥ praśamaṃ yānti vyāso brūte na saṃśayaḥ ‖

iti vyāsa virachitaṃ navagraha stotraṃ sampūrṇam ||

🙏जय श्री राम 🙏

बसंत पंचमी

#वसंत पंचमी 25 जनवरी 2023 बुधवार को दोपहर 12:35 से 26 जनवरी, गुरुवार को सुबह 10:28 तक माघ माह की पंचमी तिथी है। यदि आप और आपके जीवनसाथी के ब...