Sunday, 28 August 2022

Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी

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जानिए क्या है इस वर्ष का पूजा और गणेश स्थापना का शुभ योग :-

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 30 अगस्त 2022 को दोपहर के 03 बजकर 34 मिनट पर होगी। फिर यह चतुर्थी तिथि 31 अगस्त को दोपहर  03 बजकर 23 मिनट पर खत्म हो जाएगी। पद्म पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी का जन्म स्वाति नक्षत्र में मध्याह्न काल में हुआ था। इस कारण से इसी समय पर गणेश स्थापना और पूजा करना ज्यादा शुभ और लाभकारी होगा।

इस वर्ष गणेश उत्सव बड़े ही शुभ योग में मनाया जाएगा। गणेशोत्सव की शुरुआत 31 अगस्त बुधवार के दिन से हो रही है। शास्त्रों में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है। बुधवार के दिन भगवान गणेश की पूजा-आराधना करने पर सभी तरह के सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं फौरन ही दूर हो जाती हैं। इसके अलावा गणेश चतुर्थी पर रवि योग का संयोग भी बन रहा है। रवि योग में की जाने वाली पूजा सदैव लाभकारी होती है। इस दिन रवि योग 31 अगस्त को सुबह 06 बजकर 06  मिनट से लेकर 01 सितंबर की सुबह 12 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। वहीं अगर ग्रहों के योग की बात करें तो गणेश चतुर्थी के दिन चार प्रमुख ग्रह स्वराशि में मौजूद रहेंगे। गुरु अपनी स्वराशि मीन में, शनि मकर राशि में, बुध ग्रह स्वयं अपनी कन्या राशि में और सूर्यदेव स्वराशि सिंह में मौजूद होंगे। इस वजह से शुभ संयोग में गणेश स्थापना करने पर जीवन में वैभव, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होगी। 

कैसे होनी चाहिए भगवान गणेश की प्रतिमा:-

सार्वजनिक जगहों पर जैसे पंडालों में गणेश स्थापना के लिए भगवान गणपति की मूर्ति मिट्टी से बनी हुई होनी चाहिए।

घर और अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर भगवान गणेश की मूर्ति मिट्टी के अलावा सोने, चांदी, स्फटिक और अन्य चीजों से बनी मूर्ति रख सकते हैं।

भगवान गणेश की प्रतिमा जब भी स्थापित करें तो इस बात का ध्यान रखें कि उनकी मूर्ति खंडित अवस्था में नहीं होनी चाहिए।

गणेशजी की मूर्ति में उनके हाथों में अंकुश,पाश, लड्डू, सूंड धुमावदार और हाथ वरदान देने की मुद्रा में होनी चाहिए।  इसके अलावा उनके शरीर पर जनेऊ और उनका वाहन चूहा जरूर होना चाहिए।

गणेश मूर्ति स्थापना विधि:-

गणेश चतुर्थी के दिन सबसे पहले जल्दी सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ-सुथरा वस्त्र पहनें फिर इसके बाद पूजा का संकल्प लेते हुए भगवान गणेश का स्मरण करते हुए अपने कुल देवता का नाम मन में लें।इसके बाद पूजा स्थल पर पूर्व की दिशा में मुंह करके आसन पर बैठ जाएं।फिर छोटी चौकी पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर एक थाली में चंदन,कुमकुम, अक्षत से स्वस्तिक का निशान बनाएं।
थाली पर बने स्वस्तिक के निशान के ऊपर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करते हुए पूजा आरंभ कर दें।पूजा करने ले पहले इस मंत्र का जाप करें।

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

गणेश जी की पूजा विधि:-

सबसे पहले भगवान गणेश का आवहन करते हुए  ऊं गं गणपतये नम: मंत्र का उच्चारण करते हुए चौकी पर रखी गणेश प्रतिमा के ऊपर जल छिड़के।
भगवान गणेश की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सभी सामग्रियों को बारी बारी से उन्हें अर्पित करें। भगवान गणेश की पूजा सामग्रियों में खास चीजें होती हैं ये चीजें- हल्दी, चावल, चंदन, गुलाल,सिंदूर,मौली, दूर्वा,जनेऊ, मिठाई,मोदक, फल,माला और फूल।
इसके बाद भगवान गणेश का साथ भगवान शिव और माता पार्वती की भी पूजा करें। पूजा में धूप-दीप करते हुए सभी की आरती करें।
आरती के बाद 21 लड्डओं का भोग लगाएं जिसमें से 5 लड्डू भगवान गणेश की मूर्ति के पास रखें और बाकी को ब्राह्राणों और आम जन को प्रसाद के रूप में वितरित कर दें।
अंत में ब्राह्राणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें।

पूजा के बाद इस मंत्र का जाप करें।

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय |
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ||

गणेश जी की आरती:-

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥

जय गणेश जय गणेश,जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा ॥

'सूर' श्याम शरण आए,सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

जय गणेश जय गणेश,जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

दीनन की लाज रखो,शंभु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा ॥

Thursday, 25 August 2022

हरितालिका तीज Haritalika Teej

 इस वर्ष का मुहूर्त :-
प्रात: काल हरितालिका तीज मुहूर्त:- 5:58 AM to 8:31AM
तृतीया तिथि :-3:20 PM on29/08/2022
तृतीया तिथी समापन :-3:33 PM on 30/08/2022

हरतालिका तीज
हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन, भगवान शिव और देवी पार्वती की अस्थायी मूर्तियों को रेत से बनाया जाता है और वैवाहिक आनंद और संतान के लिए पूजा की जाती है।
हरतालिका तीज को इस नाम से जुड़ी किंवदंती के कारण जाना जाता है। हरतालिका शब्द हरात और आलिका से मिलकर बना है जिसका अर्थ क्रमशः अपहरण और महिला मित्र है। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, देवी पार्वती की सहेली उसे घने जंगल में ले गई ताकि उसके पिता उसकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से उसका विवाह न कर सकें।
हरतालिका पूजा करने के लिए सुबह का समय अच्छा माना जाता है। यदि किसी कारणवश प्रात:कालीन पूजा नहीं हो पाती है तो शिव-पार्वती पूजा करने के लिए प्रदोष का समय भी उत्तम माना जाता है। तीज पूजा जल्दी स्नान करने के बाद और अच्छे कपड़े पहनकर की जानी चाहिए। रेत से बने भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए और पूजा के दौरान हरतालिका की कथा सुनाई जानी चाहिए।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में हरतालिका व्रत को गौरी हब्बा के रूप में जाना जाता है और यह देवी गौरी का आशीर्वाद पाने के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। गौरी हब्बा के दिन महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए देवी गौरी का आशीर्वाद लेने के लिए स्वर्ण गौरी व्रत रखती हैं।
उत्तर भारतीय राज्यों, विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड में महिलाओं द्वारा तीज उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। तीन प्रसिद्ध तीज जो सावन और भाद्रपद महीनों के दौरान महिलाओं द्वारा मनाई जाती हैं -
हरियाली तीजो
कजरी तीजो
हरतालिका तीजो
अन्य तीज त्योहार जैसे अखा तीज जिसे अक्षय तृतीया और गणगौर तृतीया के रूप में भी जाना जाता है, उपरोक्त तीन तीज का हिस्सा नहीं हैं।
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को हरतालिका तीज मनाई जाती है। हरितालिका तीज हरियाली तीज के एक महीने बाद आती है और ज्यादातर समय गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले मनाई जाती है। हरितालिका तीज के दौरान महिलाएं भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं जो मिट्टी से बने होते हैं।
पूजा की विधि :-
हरतालिका पूजा करने के लिए सुबह का समय अच्छा माना जाता है। यदि किसी कारणवश प्रात:कालीन पूजा नहीं हो पाती है तो शिव-पार्वती पूजा करने के लिए प्रदोष का समय भी उत्तम माना जाता है। तीज पूजा जल्दी स्नान करने के बाद और अच्छे कपड़े पहनकर की जानी चाहिए। रेत से बने भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए और पूजा के दौरान हरतालिका की कथा सुनाई जानी चाहिए।
धार्मिक ग्रंथ व्रतराज हरतालिका पूजा करने के लिए विस्तृत विधि देता है। आमतौर पर हरतालिका तीज को महिलाओं का ही त्योहार माना जाता है। हालांकि, व्रतराज में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि यह केवल महिला पूजा है।
 व्रतराज में दिए गए मुख्य पूजा चरण इस प्रकार हैं - 
तिल और आमलक (आमालक) के चूर्ण से सुबह-सुबह स्नान करें
अच्छे कपड़े पहनना
उमा-महेश्वर को प्रसन्न करने के लिए हरतालिका व्रत करेंगे ऐसा संकल्प करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने से पहले भगवान गणेश की पूजा करें
भगवान शिव और देवी पार्वती की षोडशोपचार पूजा
देवी पार्वती के लिए अंग पूजा करे।
कथा :-

हरतालिका तीज की कथा भगवान शिव ने ही सुनाई थी, जबकि देवी पार्वती को राजा हिमालयराज के घर शैलपुत्री के रूप में उनके अवतार के बारे में याद दिलाया था।
देवी शैलपुत्री ने बचपन से ही भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या शुरू कर दी थी। उसने बारह वर्षों तक प्रार्थना की, जिसके बाद भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए 64 वर्ष की तपस्या और तपस्या की गई।
राजा हिमालयराज को अपनी पुत्री के भविष्य की चिंता सताने लगी। जब नारद मुनि शैलपुत्री के दर्शन करने आए तो उन्होंने झूठ बोला और कहा कि वे भगवान विष्णु की ओर से अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव लाए हैं। हिमालयराज ने भगवान नारद से वादा किया था कि वह अपनी बेटी का विवाह भगवान विष्णु से करेंगे। भगवान विष्णु ने भी नारद मुनि के अनुरोध पर देवी शैलपुत्री से विवाह करना स्वीकार कर लिया।
जब शैलपुत्री को अपने पिता के भगवान विष्णु से विवाह करने के वादे के बारे में पता चला, तो वह अपने दोस्त के साथ घर से चली गई। वह घने जंगल में चली गई और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करते हुए नदी के पास एक गुफा में रहने लगी। अंत में भगवान शिव प्रसन्न हुए और वादा किया कि वे उससे शादी करेंगे। अगले दिन शैलपुत्री और उनकी सहेली ने भगवान शिव के लिए उपवास रखा जो भाद्रपद माह के दौरान शुक्ल पक्ष तृतीया का दिन था।
राजा हिमालयराज अपनी बेटी के लिए चिंतित थे क्योंकि उन्हें लगा कि किसी ने उनकी बेटी का अपहरण कर लिया है। राजा हिमालयराज अपनी सेना के साथ हर जगह शैलपुत्री को खोजने लगे। अंत में उसने अपनी बेटी और उसकी सहेली को घने जंगल में पाया। उसने अपनी बेटी से घर लौटने का अनुरोध किया। शैलपुत्री ने कहा कि वह तभी घर लौटेगी जब वह भगवान शिव से उसकी शादी करने का वादा करेगा। हिमालयराज ने उसकी इच्छा पर सहमति व्यक्त की और बाद में उसका विवाह भगवान शिव से कर दिया।
इस किंवदंती के कारण, इस दिन को हरतालिका के रूप में जाना जाता है क्योंकि देवी पार्वती की सहेली उन्हें घने जंगल में ले गई थी जिसे हिमालयराज ने अपनी बेटी का अपहरण माना था। हरतालिका शब्द "हरत" और "आलिका" का संयोजन है जिसका अर्थ क्रमशः "अपहरण" और "महिला मित्र" है।








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Monday, 8 August 2022

Rinmochak Mangal Stotra

कर्ज मुक्ति के लिए हनुमानजी का ऋणमोचक मंगल स्तोत्र पढ़ना बेहद लाभकारी माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, अगर आपकी कुंडली में मंगलदोष है तो यह स्तोत्र मंगलवार को करने से दोष से मुक्ति मिल जाती है। १०८ बार त्रुटि रहित पाठ करना चाहिए और अगर त्रुटि हो रही है तो कम से कम १२० बार पाठ करे ॥

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र:

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।

स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः।।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।

धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः।।

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।

व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः।।

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।

ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।

न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।

भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।

तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्।।

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।।

तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।

महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा।।

।। इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

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Monday, 1 August 2022

नागपंचमी विशेष

#नागपंचमी #nagpanchami2022 #NaagPanchami

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर प्रमुख नाग मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और भक्त नागदेवता के दर्शन व पूजा करते हैं। सिर्फ मंदिरों में ही नहीं बल्कि घर-घर में इस दिन नागदेवता की पूजा करने का विधान है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी इस दिन श्रद्धा व भक्ति से नागदेवता का पूजन करता है उसे व उसके परिवार को कभी भी सर्प भय नहीं होता। इस बार यह पर्व 02 अगस्त, मंगलवार को है। इस दिन नागदेवता की पूजा किस प्रकार करें, इसकी विधि इस प्रकार है

 #पूजन #विधि

नागपंचमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें इसके बाद नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह #मंत्र बोलें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपाल धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।।
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

इसके बाद पूजा व उपवास का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, फूल, धूप, दीप से पूजा करें व सफेद मिठाई का भोग लगाएं। यह प्रार्थना करें-

सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।

प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जप करें-

ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

इसके बाद सर्प सूक्त का पाठ करें

ब्रह्मलोकुषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

🐍 नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें। इस प्रकार पूजा करने से नागदेवता प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं।

बसंत पंचमी

#वसंत पंचमी 25 जनवरी 2023 बुधवार को दोपहर 12:35 से 26 जनवरी, गुरुवार को सुबह 10:28 तक माघ माह की पंचमी तिथी है। यदि आप और आपके जीवनसाथी के ब...