Thursday, 8 September 2022

अनंत चतुर्दशी

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अनंत चतुर्दशी :-

पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल से अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत हुई। यह भगवान विष्णु का दिन माना जाता है। अनंत भगवान ने सृष्टि के आरंभ में चौदह लोकों तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह की रचना की थी। इन लोकों का पालन और रक्षा करने के लिए वह स्वयं भी चौदह रूपों में प्रकट हुए थे, जिससे वे अनंत प्रतीत होने लगे। इसलिए अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ यदि कोई व्यक्ति श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण होती है। धन-धान्य, सुख-संपदा और संतान आदि की कामना से यह व्रत किया जाता है। भारत के कई राज्यों में इस व्रत का प्रचलन है। इस दिन भगवान विष्णु की लोक कथाएं सुनी जाती है।

इस दिन भगवान विष्णु की कथा, पूजा के लिए चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के पश्चात दो मुहूर्त में व्याप्त होनी चाहिए। पूर्णिमा का सहयोग होने से इसका बल बढ़ जाता है। यदि चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के बाद दो मुहूर्त से पहले ही समाप्त हो जाए, तो अनंत चतुर्दशी पिछले दिन मनाये जाने का विधान है। इस व्रत की पूजा और मुख्य कर्मकाल दिन के प्रथम भाग में करना शुभ माने जाते हैं। यदि प्रथम भाग में पूजा करने से चूक जाते हैं, तो मध्याह्न के शुरुआती चरण में करना चाहिए। मध्याह्न का शुरुआती चरण दिन के सप्तम से नवम मुहूर्त तक होता है।

जैसा इस व्रत के नाम से प्रतीत होता है कि यह दिन उस अंत न होने वाले सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु की भक्ति का दिन है। 
यूं तो यह व्रत नदी-तट पर किया जाना चाहिए और हरि की लोककथाएं सुननी चाहिए। लेकिन संभव ना होने पर घर में ही स्थापित मंदिर के सामने हरि से इस प्रकार की प्रार्थना की जाती है- 'हे वासुदेव, इस अनंत संसार रूपी महासमुद्र में डूबे हुए लोगों की रक्षा करो तथा उन्हें अनंत के रूप का ध्यान करने में संलग्न करो, अनंत रूप वाले प्रभु तुम्हें नमस्कार है।'

पूजा कैसे करे :-

प्रात:काल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर कलश की स्थापना करें। कलश पर अष्टदल कमल के समान बने बर्तन में कुश से निर्मित अनंत की स्थापना की जाती है। इसके आगे कुंकूम, केसर या हल्दी से रंग कर बनाया हुआ कच्चे डोरे का चौदह गांठों वाला 'अनंत' भी रखा जाता है। कुश के अनंत की वंदना करके, उसमें भगवान विष्णु का आह्वान तथा ध्यान करके गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन करें। 

इस व्रत में सूत या रेशम के धागे को लाल कुमकुम से रंग, उसमें चौदह गांठे (14 गांठे भगवान श्री हरि के द्वारा 14 लोकों की प्रतीक मानी गई है) लगाकर राखी की तरह का अनंत बनाया जाता है। इस अनंत रूपी धागे को पूजा में भगवान पर चढ़ा कर व्रती अपने बाजु में बाँधते हैं। पुरुष दाएं तथा स्त्रियां बाएं हाथ में अनंत बाँधती है। यह अनंत हम पर आने वाले सब संकटों से रक्षा करता है। यह अनंत धागा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देता है। यह व्रत धन पुत्रादि की कामना से किया जाता है। इस दिन नये धागे के अनंत को धारण कर पुराने धागे के अनंत का विसर्जन किया जाता है ।

क्या है मुहूर्त :-

चतुर्दशी तिथि प्रारंभ:-
08 सितम्बर को रात्रि 09 बजकर 01 मिनट से ।

चतुर्दशी तिथि समाप्‍त:-
09 सितम्बर को सायं 06 बजकर 00 मिनट तक।

अनंत चर्तुदशी पूजा का मुहूर्त:-
09 सितंबर को सुबह 05 बजकर 57 मिनट से सायं 06 बजकर 05 मिनट तक रहेगा।

चूंकि 09 तारीख को पूरे दिन की चतुर्दशी तिथि है, ऐसे में राहुकाल को छोड़कर किसी भी समय पूजन किया जा सकता है। 09 सितंबर को राहुकाल दिन 10:40 से 12:14 तक रहेगा।

पूजा की सामग्री क्या क्या सामान सहेजे :-

• शेषनाग पर लेटे हुए श्री हरि की मूर्ति अथवा तस्वीर 
• आसन (कम्बल)
• धूप - एक पैकेट
• पुष्पों की माला – चार
• फल – सामर्थ्यानुसार
• पुष्प (14 प्रकार के)
• अंग वस्त्र –एक
• नैवैद्य(मालपुआ )
• मिष्ठा्न - सामर्थ्यानुसार
• अनंत सूत्र (14 गाँठों वाले ) – नये
• अनंत सूत्र (14 गाँठों वाले ) – पुराने
• यज्ञोपवीत (जनेऊ) – एक जोड़ा
• वस्त्र
• पत्ते – 14 प्रकार के वृक्षों का
• कलश (मिट्टी का)- एक
• कलश पात्र (मिट्टी का)- एक 
• दूर्बा 
• चावल – 250 ग्राम
• कपूर- एक पैकेट
• तुलसी दल
• पान- पाँच
• सुपारी- पाँच
• लौंग – एक पैकेट
• इलायची - एक पैकेट
• पंचामृत (दूध,दही,घी,शहद,शक्कर)

अनंत चतुर्दशी व्रत पूजन विधि :-

पुराणों मे इस व्रत को करने का विधान नदी या सरोवर पर उत्तम माना गया है। परंतु आज के आधुनिक युग में यह सम्भव नहीं है। अत: घर में ही पूजा स्थान पर शुद्धिकरण करके अनंत भगवान की पूजा करें तथा कथा सुने। साधक प्रात: काल स्नानादि कर नित्यकर्मों से निवृत हो जायें। सभी सामग्री को एकत्रित कर लें तथा पूजा स्थान को पवित्र कर लें। पत्नी सहित आसन पर बैठ जायें। पूजागृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र (डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्रकी षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांतअनन्तसूत्रको मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें।

अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंतसूत्रबांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया। कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्रबांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

पवित्रीकरण और मंत्र :-

अब दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न पवित्रीकरण मंत्र का उच्चारण करें और सभी सामग्री , उपस्थित जन- समूह पर उस जल का छिंटा दें कर सभी को पवित्र कर लें ।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्व अवस्थांगत: अपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्य अभ्यन्तर: शुचिः॥

आचमन 
दाएँ हाथ में जल लें निम्न आचमन मंत्र के द्वारा तीन बार आचमन करें 
“ॐ केशवाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
“ॐ नारायणाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
“ॐ वासुदेवाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
तत्पश्चात“ॐ हृषिकेशाय नमः” कहते हुए दाएँ हाथ के अंगूठे के मूल से होंठों को दो बार पोंछकर हाथों को धो लें।

पवित्री धारण :-

तत्पश्चात् निम्न मंत्र के द्वारा कुश निर्मित पवित्री धारण करे -
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । 
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।
स्वस्तिवाचन – 
हाथ में अक्षत तथा पुष्प लें और निम्न मंत्रों को बोलते हुए थोड़ा –थोड़ा पुष्प भूमि पर छोड़ते जायें ।

ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नम : । ॐ केशवाय नम : । ॐ नारायणणाय नम : । ॐ माधवाय नम : । ॐ गोविंदाय नम : । ॐ विष्णवे नम : । ॐ मधुसूदनाय नम : । ॐ त्रिविक्रमाय नम : । ॐ वामनाय नम : । ॐ श्रीराधाय नम : । ॐ ह्रषीकेशाय नम : । ॐ पद्मनाभाय नम : । ॐ दामोदराय नम : । ॐ संकर्षणाय नम : । ॐ वासुदेवाय नम : । ॐ प्रद्युम्नाय नम : । ॐ अनिरुद्धाय नम : । ॐ पुरुषोत्तमाय नम : । ॐ अधोक्षजाय नम : । ॐ नरसिंहाय नम : । ॐ अच्युताय नम : । ॐ जनार्दनाय नम : । ॐ उपेंद्राय नम : । ॐ हरये नम : । ॐ श्रीकृष्णाय नम : । ॐ श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नम : । ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम : । शचीपुरन्दराभ्यां नम : । मातृपितृभ्यां नम : । इष्टदेवताभ्यो नम : । ग्रामदेवताभ्यो नम : । स्थानदेवताभ्यो नम : । वास्तुदेवताभ्यो नम : । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम : । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम : ।

संकल्प कैसे ले : - 

हाथ मे अक्ष्त ,पान का पत्ता ,सुपारी तथा सामर्थ्यानुसार सिक्के लेकर संकल्प मंत्र उच्चारित करते हुए संकल्प करें – 
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्यॐ विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्द्धे विष्नुपदे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे, कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे अमुकक्षेत्रे (अपने नगर तथा क्षेत्र का नाम लें) बौद्धावतारे अमुकनाम संवत्सरे श्रीसुर्ये अमुकयाने अमुक ऋतो ( ऋतु का नाम लें ) महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे भाद्र मासे शुक्ल पक्षे चतुर्दशी तिथौ अमुक वासरे ( वार का नाम लें ) अमुक नक्षत्रे ( नक्षत्र का नाम लें ) अमुक योगे अमुक-करणे अमुकराशिस्थिते चंद्रे ( जिस राशि में चंद्रमा स्थित हो,उसका नाम लें ) अमुकराशिस्थिते श्रीसुर्ये (जिस राशि में सुर्य स्थित हो,उसका नाम लें ) देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथा- राशिस्थान-स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह-गुणग़ण-विशेषण- विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुक गोत्र (अपने गोत्र का नाम लें ) अमुकनाम ( अपना नाम ले ) ऽहं मम सकुटुम्बस्य क्षेमैश्वर्यायुरारोग्यचतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं मया आचरितं वा आचार्यमाणस्य व्रतस्य सम्पूर्णफलावाप्त्यर्थं श्रीमदनन्तपूजनमहंकरिष्ये। श्रीमदनन्तव्रतांगत्वेन गणेशपूजनं ,यमुनापूजनादिकं च करिष्ये।
फिर कथा कहें ।।

क्या है व्रत कथा :-

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्यमुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुजअनन्तदेवका दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्तसूत्रका तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्यमुनिने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मोका फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

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Sunday, 28 August 2022

Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी

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जानिए क्या है इस वर्ष का पूजा और गणेश स्थापना का शुभ योग :-

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 30 अगस्त 2022 को दोपहर के 03 बजकर 34 मिनट पर होगी। फिर यह चतुर्थी तिथि 31 अगस्त को दोपहर  03 बजकर 23 मिनट पर खत्म हो जाएगी। पद्म पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी का जन्म स्वाति नक्षत्र में मध्याह्न काल में हुआ था। इस कारण से इसी समय पर गणेश स्थापना और पूजा करना ज्यादा शुभ और लाभकारी होगा।

इस वर्ष गणेश उत्सव बड़े ही शुभ योग में मनाया जाएगा। गणेशोत्सव की शुरुआत 31 अगस्त बुधवार के दिन से हो रही है। शास्त्रों में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है। बुधवार के दिन भगवान गणेश की पूजा-आराधना करने पर सभी तरह के सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं फौरन ही दूर हो जाती हैं। इसके अलावा गणेश चतुर्थी पर रवि योग का संयोग भी बन रहा है। रवि योग में की जाने वाली पूजा सदैव लाभकारी होती है। इस दिन रवि योग 31 अगस्त को सुबह 06 बजकर 06  मिनट से लेकर 01 सितंबर की सुबह 12 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। वहीं अगर ग्रहों के योग की बात करें तो गणेश चतुर्थी के दिन चार प्रमुख ग्रह स्वराशि में मौजूद रहेंगे। गुरु अपनी स्वराशि मीन में, शनि मकर राशि में, बुध ग्रह स्वयं अपनी कन्या राशि में और सूर्यदेव स्वराशि सिंह में मौजूद होंगे। इस वजह से शुभ संयोग में गणेश स्थापना करने पर जीवन में वैभव, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होगी। 

कैसे होनी चाहिए भगवान गणेश की प्रतिमा:-

सार्वजनिक जगहों पर जैसे पंडालों में गणेश स्थापना के लिए भगवान गणपति की मूर्ति मिट्टी से बनी हुई होनी चाहिए।

घर और अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर भगवान गणेश की मूर्ति मिट्टी के अलावा सोने, चांदी, स्फटिक और अन्य चीजों से बनी मूर्ति रख सकते हैं।

भगवान गणेश की प्रतिमा जब भी स्थापित करें तो इस बात का ध्यान रखें कि उनकी मूर्ति खंडित अवस्था में नहीं होनी चाहिए।

गणेशजी की मूर्ति में उनके हाथों में अंकुश,पाश, लड्डू, सूंड धुमावदार और हाथ वरदान देने की मुद्रा में होनी चाहिए।  इसके अलावा उनके शरीर पर जनेऊ और उनका वाहन चूहा जरूर होना चाहिए।

गणेश मूर्ति स्थापना विधि:-

गणेश चतुर्थी के दिन सबसे पहले जल्दी सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ-सुथरा वस्त्र पहनें फिर इसके बाद पूजा का संकल्प लेते हुए भगवान गणेश का स्मरण करते हुए अपने कुल देवता का नाम मन में लें।इसके बाद पूजा स्थल पर पूर्व की दिशा में मुंह करके आसन पर बैठ जाएं।फिर छोटी चौकी पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर एक थाली में चंदन,कुमकुम, अक्षत से स्वस्तिक का निशान बनाएं।
थाली पर बने स्वस्तिक के निशान के ऊपर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करते हुए पूजा आरंभ कर दें।पूजा करने ले पहले इस मंत्र का जाप करें।

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

गणेश जी की पूजा विधि:-

सबसे पहले भगवान गणेश का आवहन करते हुए  ऊं गं गणपतये नम: मंत्र का उच्चारण करते हुए चौकी पर रखी गणेश प्रतिमा के ऊपर जल छिड़के।
भगवान गणेश की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सभी सामग्रियों को बारी बारी से उन्हें अर्पित करें। भगवान गणेश की पूजा सामग्रियों में खास चीजें होती हैं ये चीजें- हल्दी, चावल, चंदन, गुलाल,सिंदूर,मौली, दूर्वा,जनेऊ, मिठाई,मोदक, फल,माला और फूल।
इसके बाद भगवान गणेश का साथ भगवान शिव और माता पार्वती की भी पूजा करें। पूजा में धूप-दीप करते हुए सभी की आरती करें।
आरती के बाद 21 लड्डओं का भोग लगाएं जिसमें से 5 लड्डू भगवान गणेश की मूर्ति के पास रखें और बाकी को ब्राह्राणों और आम जन को प्रसाद के रूप में वितरित कर दें।
अंत में ब्राह्राणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें।

पूजा के बाद इस मंत्र का जाप करें।

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय |
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ||

गणेश जी की आरती:-

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥

जय गणेश जय गणेश,जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा ॥

'सूर' श्याम शरण आए,सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

जय गणेश जय गणेश,जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥

दीनन की लाज रखो,शंभु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी ॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा ॥

Thursday, 25 August 2022

हरितालिका तीज Haritalika Teej

 इस वर्ष का मुहूर्त :-
प्रात: काल हरितालिका तीज मुहूर्त:- 5:58 AM to 8:31AM
तृतीया तिथि :-3:20 PM on29/08/2022
तृतीया तिथी समापन :-3:33 PM on 30/08/2022

हरतालिका तीज
हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन, भगवान शिव और देवी पार्वती की अस्थायी मूर्तियों को रेत से बनाया जाता है और वैवाहिक आनंद और संतान के लिए पूजा की जाती है।
हरतालिका तीज को इस नाम से जुड़ी किंवदंती के कारण जाना जाता है। हरतालिका शब्द हरात और आलिका से मिलकर बना है जिसका अर्थ क्रमशः अपहरण और महिला मित्र है। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, देवी पार्वती की सहेली उसे घने जंगल में ले गई ताकि उसके पिता उसकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से उसका विवाह न कर सकें।
हरतालिका पूजा करने के लिए सुबह का समय अच्छा माना जाता है। यदि किसी कारणवश प्रात:कालीन पूजा नहीं हो पाती है तो शिव-पार्वती पूजा करने के लिए प्रदोष का समय भी उत्तम माना जाता है। तीज पूजा जल्दी स्नान करने के बाद और अच्छे कपड़े पहनकर की जानी चाहिए। रेत से बने भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए और पूजा के दौरान हरतालिका की कथा सुनाई जानी चाहिए।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में हरतालिका व्रत को गौरी हब्बा के रूप में जाना जाता है और यह देवी गौरी का आशीर्वाद पाने के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। गौरी हब्बा के दिन महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए देवी गौरी का आशीर्वाद लेने के लिए स्वर्ण गौरी व्रत रखती हैं।
उत्तर भारतीय राज्यों, विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड में महिलाओं द्वारा तीज उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। तीन प्रसिद्ध तीज जो सावन और भाद्रपद महीनों के दौरान महिलाओं द्वारा मनाई जाती हैं -
हरियाली तीजो
कजरी तीजो
हरतालिका तीजो
अन्य तीज त्योहार जैसे अखा तीज जिसे अक्षय तृतीया और गणगौर तृतीया के रूप में भी जाना जाता है, उपरोक्त तीन तीज का हिस्सा नहीं हैं।
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को हरतालिका तीज मनाई जाती है। हरितालिका तीज हरियाली तीज के एक महीने बाद आती है और ज्यादातर समय गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले मनाई जाती है। हरितालिका तीज के दौरान महिलाएं भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं जो मिट्टी से बने होते हैं।
पूजा की विधि :-
हरतालिका पूजा करने के लिए सुबह का समय अच्छा माना जाता है। यदि किसी कारणवश प्रात:कालीन पूजा नहीं हो पाती है तो शिव-पार्वती पूजा करने के लिए प्रदोष का समय भी उत्तम माना जाता है। तीज पूजा जल्दी स्नान करने के बाद और अच्छे कपड़े पहनकर की जानी चाहिए। रेत से बने भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए और पूजा के दौरान हरतालिका की कथा सुनाई जानी चाहिए।
धार्मिक ग्रंथ व्रतराज हरतालिका पूजा करने के लिए विस्तृत विधि देता है। आमतौर पर हरतालिका तीज को महिलाओं का ही त्योहार माना जाता है। हालांकि, व्रतराज में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि यह केवल महिला पूजा है।
 व्रतराज में दिए गए मुख्य पूजा चरण इस प्रकार हैं - 
तिल और आमलक (आमालक) के चूर्ण से सुबह-सुबह स्नान करें
अच्छे कपड़े पहनना
उमा-महेश्वर को प्रसन्न करने के लिए हरतालिका व्रत करेंगे ऐसा संकल्प करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने से पहले भगवान गणेश की पूजा करें
भगवान शिव और देवी पार्वती की षोडशोपचार पूजा
देवी पार्वती के लिए अंग पूजा करे।
कथा :-

हरतालिका तीज की कथा भगवान शिव ने ही सुनाई थी, जबकि देवी पार्वती को राजा हिमालयराज के घर शैलपुत्री के रूप में उनके अवतार के बारे में याद दिलाया था।
देवी शैलपुत्री ने बचपन से ही भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या शुरू कर दी थी। उसने बारह वर्षों तक प्रार्थना की, जिसके बाद भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए 64 वर्ष की तपस्या और तपस्या की गई।
राजा हिमालयराज को अपनी पुत्री के भविष्य की चिंता सताने लगी। जब नारद मुनि शैलपुत्री के दर्शन करने आए तो उन्होंने झूठ बोला और कहा कि वे भगवान विष्णु की ओर से अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव लाए हैं। हिमालयराज ने भगवान नारद से वादा किया था कि वह अपनी बेटी का विवाह भगवान विष्णु से करेंगे। भगवान विष्णु ने भी नारद मुनि के अनुरोध पर देवी शैलपुत्री से विवाह करना स्वीकार कर लिया।
जब शैलपुत्री को अपने पिता के भगवान विष्णु से विवाह करने के वादे के बारे में पता चला, तो वह अपने दोस्त के साथ घर से चली गई। वह घने जंगल में चली गई और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करते हुए नदी के पास एक गुफा में रहने लगी। अंत में भगवान शिव प्रसन्न हुए और वादा किया कि वे उससे शादी करेंगे। अगले दिन शैलपुत्री और उनकी सहेली ने भगवान शिव के लिए उपवास रखा जो भाद्रपद माह के दौरान शुक्ल पक्ष तृतीया का दिन था।
राजा हिमालयराज अपनी बेटी के लिए चिंतित थे क्योंकि उन्हें लगा कि किसी ने उनकी बेटी का अपहरण कर लिया है। राजा हिमालयराज अपनी सेना के साथ हर जगह शैलपुत्री को खोजने लगे। अंत में उसने अपनी बेटी और उसकी सहेली को घने जंगल में पाया। उसने अपनी बेटी से घर लौटने का अनुरोध किया। शैलपुत्री ने कहा कि वह तभी घर लौटेगी जब वह भगवान शिव से उसकी शादी करने का वादा करेगा। हिमालयराज ने उसकी इच्छा पर सहमति व्यक्त की और बाद में उसका विवाह भगवान शिव से कर दिया।
इस किंवदंती के कारण, इस दिन को हरतालिका के रूप में जाना जाता है क्योंकि देवी पार्वती की सहेली उन्हें घने जंगल में ले गई थी जिसे हिमालयराज ने अपनी बेटी का अपहरण माना था। हरतालिका शब्द "हरत" और "आलिका" का संयोजन है जिसका अर्थ क्रमशः "अपहरण" और "महिला मित्र" है।








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Monday, 8 August 2022

Rinmochak Mangal Stotra

कर्ज मुक्ति के लिए हनुमानजी का ऋणमोचक मंगल स्तोत्र पढ़ना बेहद लाभकारी माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, अगर आपकी कुंडली में मंगलदोष है तो यह स्तोत्र मंगलवार को करने से दोष से मुक्ति मिल जाती है। १०८ बार त्रुटि रहित पाठ करना चाहिए और अगर त्रुटि हो रही है तो कम से कम १२० बार पाठ करे ॥

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र:

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।

स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः।।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।

धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः।।

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।

व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः।।

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।

ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।

न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।

भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।

तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्।।

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।।

तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।

महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा।।

।। इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

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Monday, 1 August 2022

नागपंचमी विशेष

#नागपंचमी #nagpanchami2022 #NaagPanchami

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर प्रमुख नाग मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और भक्त नागदेवता के दर्शन व पूजा करते हैं। सिर्फ मंदिरों में ही नहीं बल्कि घर-घर में इस दिन नागदेवता की पूजा करने का विधान है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी इस दिन श्रद्धा व भक्ति से नागदेवता का पूजन करता है उसे व उसके परिवार को कभी भी सर्प भय नहीं होता। इस बार यह पर्व 02 अगस्त, मंगलवार को है। इस दिन नागदेवता की पूजा किस प्रकार करें, इसकी विधि इस प्रकार है

 #पूजन #विधि

नागपंचमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें इसके बाद नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह #मंत्र बोलें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपाल धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।।
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

इसके बाद पूजा व उपवास का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, फूल, धूप, दीप से पूजा करें व सफेद मिठाई का भोग लगाएं। यह प्रार्थना करें-

सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।

प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जप करें-

ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

इसके बाद सर्प सूक्त का पाठ करें

ब्रह्मलोकुषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

🐍 नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें। इस प्रकार पूजा करने से नागदेवता प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं।

Monday, 20 June 2022

Navgruh Gayatri Mantra

#gayatrimantra according to planets.

॥ #गायत्रीमन्त्राः ॥

#सूर्य #गायत्री...
1) ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

 2) ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नोः भानुः प्रचोदयात् ॥

 3) ॐ प्रभाकराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नोः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

4) ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नोः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

5) ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्नोः आदित्यः प्रचोदयात् ॥ 

6) ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकराय धीमहि तन्नोः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

7) ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि तन्नोः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

8)ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्नोः सूर्यः प्रचोदयात् ।।

#चन्द्र #गायत्री...

9) ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो श्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

10) ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि तन्नोश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

11) ॐ निशाकराय विद्महे कलानाथाय धीमहि तन्नोः सोमः प्रचोदयात् ॥ 

#मंगळ #गायत्री...

12) ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नोः भौमः प्रचोदयात् ॥ 

13) ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नोः कुजः प्रचोदयात् ॥

 14) ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नोः भौमः प्रचोदयात् ॥

15) ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नोः भौमः प्रचोदयात् ॥

#बुध #गायत्री...

16) ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नोः बुधः प्रचोदयात् ॥

 17) ॐ चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नोः बुधः प्रचोदयात् ॥

18) ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नोः बुधः प्रचोदयात् ॥

#गुरु #गायत्री...

19) ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नोः गुरुः प्रचोदयात् ॥

 20) ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नोः गुरुः प्रचोदयात् ॥

#शुक्र #गायत्री...

 21) ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नोः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

22) ॐ रजदाभाय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नोः शुक्रः प्रचोदयात् ॥ 

23) ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नोः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

#शनि #गायत्री...

24) ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नोः मन्दः प्रचोदयात् ॥ 

25) ॐ शनैश्चराय विद्महे सूर्यपुत्राय धीमहि तन्नोः मन्दः प्रचोदयात् ॥

 26) ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नोः सौरिः प्रचोदयात् ।।

#राहू #गायत्री...

27) ॐ नागध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नोः राहुः प्रचोदयात् ॥

28) ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नोः राहुः प्रचोदयात् ॥

#केतू #गायत्री...

29) ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नोः केतुः प्रचोदयात् ॥

30) ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नो केतुः प्रचोदयात् ॥

31) ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नोः केतुः प्रचोदयात् ॥

Recite the Gayatri Mantra as per placement of planets .

Thursday, 26 May 2022

Effects of Planet in Nakshatra

#Effects of #Planet in #Nakshatra: #Series
#aswini

1. Results of Planets in Aswini 

#Sun in #Aswini: The native will have Fame, wealth, Religious and blood defects. Moon in Aswini: The native will have a helping nature, cruel, Position. 

#Mars in #Aswini: The native will be short stature, will attain power, will have Average fortune, fear of fire, happy marital life, and will beget girl children. 

#Mercury in #Aswini: The native will be deceitful, characterless, well educated, famous after 35th year, will become a doctor, expert in surgery, religious, writing skills. 

#Jupiter in #Aswini: The native will acquire much knowledge, good at speaking, writing skills, loans, fame, profit due to speculation. 

#Venus in #Aswini: The native will be stout bodied, intelligent, political life, writing skills; will have singing and acting skills. 

#Saturn in #Aswini: The native will have a problematic child hood, income from forests, unsocial activities, and will have gambling skills.

#Rahu in #Aswini: The native will be intelligent, strong body, religious, trouble in the head, spiritual nature, poverty, and will not have marital happiness. The native will also develop diseases due to defects in Vata. 

#Ketu in #Aswini: The native will be good oratory skills, well educated, fame, will be learned in Sastra, will have mass appeal, will be associated with lowly people and will be having a good name in the native place.

2. #Significations of #Planets in #Moola

 #Sun in #Moola: respects parents, charitable nature, small business, Trachphonia, anaemia, weak body. 

#Mars in #Moola: wounds, harsh speech, dependant on others, results only if works hard, impatience, squabbles, disappointment, despair, Regret. 

#Mercury in #Moola: favourite to the rulers, position equal to a minister, happy life, intellectual, interested in old books. 

#Jupiter in #Moola: heads many organisations, sincere, position equal to that of a king, troubles due to women, all comforts, familial comforts, charitable nature. 

#Venus in #Moola: respects relatives, eye diseases, charitable nature, less happiness, flexible nature. 

#Saturn in #Moola: Good, knowledge in various sciences and Shashtra and income from the same, slim personality, brings fame to family, leadership of village. 

#Rahu in #Moola: concerned, less happiness, good cultured, fortune after 50th year, foreign travel, Indecent.

#Ketu in #Moola: cabinet rank, defects of blood, lands, responsibilities, fear of enemies, religious, medium wealth, unexpected responsibilities

बसंत पंचमी

#वसंत पंचमी 25 जनवरी 2023 बुधवार को दोपहर 12:35 से 26 जनवरी, गुरुवार को सुबह 10:28 तक माघ माह की पंचमी तिथी है। यदि आप और आपके जीवनसाथी के ब...